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रिश्ते की डोर: Vrriti Sharma

  • Writer: DPC
    DPC
  • Aug 4, 2020
  • 2 min read

Updated: Aug 9, 2020


आज सुबह नींद से जागी तो,

हाथ में एक रिश्ते का सिरा

मुट्ठी में पकड़ा पाया |

और दुसरा सिरा यूँही अकेला,

चुपचाप ज़मीन पर पड़ा था |

जाकर उठाया उसे, तो किसी के

हाथों की गरमायिश महसूस की.

शायद कोई बस कुछ ही देर हुई,

छोड़ उसे वहाँ, आज़ाद हो चला था |

फिर अपने हाथ की तरफ़ देख,

सोचने लगी, की, क्या मैं भी इसे

यही छोड आज़ाद हो निकलूँ ?

पर तभी कानों में हंसी के ठहाके,

दो लोगों की प्यार भरी बातें,

न जाने कितने वादे, सब गूंज

उठे | मैं हैरान, परेशान सोच में

थी और सोच में ही रह गयी |

क्या पता शायद कभी वो लोट

आये, और मैं ना मिली तो |

या शायद वो ना भी आये,

और मेरा इन्तज़ार, इन्तज़ार

ही बन कर रैह गया तो ?

क्या उसने सोचा होगा इस

रिश्ते की डोर से आज़ाद होने

से पहले, पर गर सोचा होता

तो क्यों कहाँ नहीं मुझसे

या शायद ना भी सोचा हो |

इसी उधेड़बुन में खड़ी मैं,

बस दोनों सिरों को देखती

रही | फिर सोचा एक रिश्ते

को तन्हा नहीं चलाया जाता,

तो क्या ये ख़त्म हुआ ?

क्यों बना था ये, गर यूँही

ख़त्म होना था इसे |

इस क्यों, क्या और कैसे

के सैंकड़ों सवाल और

कोई जवाब नहीं | परेशान हो

मैंने अपने हाथ का सिरा छोड़ना

चाहा, और भाग जाना चाहती थी

उन सवालों से | पर, ये क्या

वो सिरा तो छूट ही नहीं रहा |

जैसे मेरी हथेली में जड़ दिया

हो किसी ने लकीरों की तरह |

ये देख हंस पड़ी मैं और उसे

और कस कर पकड़ दुसरा

सिरा भी उठा वहीं तन्हा

बैठ उन्हें देखती रही...

Vrriti Sharma is a humanitarian by profession and a poet and singer by heart. She believes that the little vacuum of our lives should be filled with beautiful poetry and music. Her work can be viewed at Rhetorical Journey.

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